भारत की नरेंद्र मोदी सरकार, जिसके ज़िम्मेदारी है कि वह इस देश की राजधानी की क़ानून और व्यवस्था को बनाए रखे, उसकी नाक के नीचे तीन दिनों तक उपद्रवियों और दंगाईयों द्वारा इंसानियत को तार-तार किया गया और वह अमेरिका से आए उस देश के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प, उनकी पत्नी मिलानिया ट्रम्प और उनकी बेटी एवं दामाद की आव-भगत में लगी रही। देश की राजधानी में हुए अराजकता में एक पुलिसकर्मी, एक आईबी कर्मी सहित 42 लोगों की जान चली गई है और सैकड़ों लोग घायल हो गए। जबकि न जाने कितनों के घरे जले, दुकाने लूटी गईं और उन्हें जला दिया गया, साथ ही मस्जिद, माज़ार और स्कूलों को भी नहीं छोड़ा गया।
इस सुनियोजित हिंसा में आम कामगार लोगों, जिनमें हिंदू और मुसलमान दोनों शामिल हैं, को अपनी जान गंवानी पड़ी है। इस बात में कोई शक नहीं हो सकता है कि हिंसा से एक दिन पहले भाजपा नेता कपिल मिश्रा द्वारा सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों को दिए गए रास्ता खाली करने या अंजाम भुगतने के अल्टीमेटम ने इस चिंगारी भड़काने का मुख्य काम किया। लेकिन इसके साथ ही कहीं गहरे सांस्थानिक और राजनीतिक कारक भी हैं, जिन्होंने दिल्ली को इस गर्त में धकेलने में अपनी भूमिका निभाई है। पहला और सबको नज़र आने वाला कारण है दिल्ली पुलिस का पक्षपातपूर्ण रवैया, जिसके पीछे काफी हद तक भारत की सत्ताधारी पार्टी भाजपा के समर्थन और प्रोत्साहन का हाथ है। क्योंकि विश्वविद्यालय परिसरों से लेकर सड़कों तक बीजेपी के राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने वाली हिंसक भीड़ के सामने मूकदर्शक बन कर खड़े रहना और उसे अपनी मनमानी करने देना, दिल्ली पुलिस की आदत सी बन गई है।
पिछले दिनों जिसतर के फोटो और वीडियो सामने आए हैं उससे कहीं न कहीं यह आरोप दिल्ली पुलिस पर ज़रूर लगता है कि वह पिछली कई घटनाओं में पीड़ित लोगों की रक्षा करने के बजाए उलटा पीड़ितों पर हमला करने में कट्टर हिंदूवादी गुटों का पक्ष लेते देखी जा सकती है। वैसे दिल्ली पुलिस जिस तरह से किसी दंडात्मक कार्रवाई का ख़ौफ़ खाए बिना अपनी ड्यूटी से कतरा रही है, उसने एक ऐसी स्थिति को जन्म दिया है, जिसे किसी भी सभ्य देश के लिए चिंताजनक कहा जा सकता है। जिस तरह हाल के दिनों और विशेष कर दिल्ली हिंसा में पुलिस के रवैये को देखा गया है उससे हर कोई ख़ौफ़ में है। लगातार पुलिस आम जनता की संपत्तियों को नुक़सान पहुंचाते देखी गई है। जनता की सुरक्षा में लगे सीसीटीवी कैमरों को तोड़ते देखी गई है और साथ ही पुलिस द्वारा ऐसा भाषा का प्रयोग किया गया है जो उसे कहीं न कहीं संप्रादायिकता की ओर ले जा रही है।
जहां भारतीय समाज में पहले से ही पुलिस को बहुत ही अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता रहा है वहीं यह समाज हमेशा से मीडिया और पत्रकारों की पूरा प्यार और इज़्ज़त देता आया है। लेकिन वर्ष 2014 से पहले से ही धीरे-धीरे भारतीय मीडिया उद्योगपतियों के हाथों की कठपुत्ली बनाता चला गया और वह सम्मान और इज़्ज़त जो इस देश की जनता पत्रकार एवं पत्रकारिता को देती थी उसमें लगातार गिरावट आने लगी। अब तो भारतीय मीडिया कई भागों में बट गया है जिसमें सबसे बड़ा भाग स्वयं इस देश की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के पक्ष में है। भारतीय मीडिया लगातार जिस तरह हिन्दू-मुसलमान पर 24 घंटे बात करता है और ऐसे लोगों को डिबेट में शामिल करता है कि जिन्हें न समाज की फ़िक्र होती है और न ही देश की तो यह कहा जा सकता है कि भारत में बढ़ते संप्रदायिक उन्माद के लिए बहुत हद तक इस देश का मीडिया भी ज़िम्मेदार है।
बीती कुछ रातों से टेलीविज़न के परदे पर आने वाली तस्वीरों और विभिन्न संस्थानों के पत्रकारों द्वारा हिंसक गिरोहों के हमलों का सामना करते हुए भी की गई रिपोर्टिंग ने 1984- आखिरी बार जब दिल्ली ऐसे संगठित सांप्रदायिक हिंसा की ज़द में आयी थी, – और 2002, जब नरेंद्र मोदी के शासन में गुजरात राज्य कई हफ्तों तक जलता रहा था, की भयावह स्मृतियों को फिर से ताज़ा कर दिया है। दूसरी बात, इस पूरी हिंसा के दौरान भाजपा और संघ परिवार के नेताओं की भूमिका निंदनीय रही है। कपिल मिश्रा के अलावा पार्टी के विधायकों और नेताओं ने या तो खुलेआम मुस्लिम विरोधी घृणा को भड़काने का काम किया है या सीएए विरोधी प्रदर्शनों- जो पूरी तरह से शांतिपूर्ण रहे हैं- को देशद्रोही क़रार देकर उन्हें बदनाम करने में मदद की है। ऐसा नहीं है कि इस काम में बीजेपी के दूसरे और तीसरे दर्जे के नेता आगे रहे हों बल्कि दिल्ली चुनाव के समय स्वयं भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इस देश के गृह मंत्री अमित शाह ने भी सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ ज़हर उगला था।
बहरहाल इस बात को लेकर किसी को कोई भ्रम नहीं रहना चाहिए कि 2020 के दिल्ली के दंगे सांप्रदायिक आधार पर देश को बांटने की सुनियोजित कोशिश का नतीजा नहीं हैं। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व और केंद्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की भाजपा सरकारों ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीक़े से मुसलमानों के ख़िलाफ़ सुनियोजित तरीक़े से नफ़रत भड़काने का काम किया है। जिस समय दिल्ली जल रही थी, उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की आव-भगत करने में व्यस्त भारतीय प्रधानमंत्री को ‘शांति और सौहार्द’के लिए ट्वीट करने में बुधवार तक का समय लग गया। दिल्ली और उनके अपने इतिहास को देखते हुए मोदी की चुप्पी अपनी कहानी ख़ुद कहती है।
द-वायर के संपादकीय से प्रभावित लेख (रविश ज़ैदी)
(इस लेख से पार्स टुडे हिन्दी का सहमत होना ज़रूरी नहीं है)